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दादी-नानी की कहानी

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आपकी लाठी पकड़े दौड़ता था बचपन, बागीचे के उन पेड़ो से जा लगा था मन, आपकी पकवानों के महकते स्वाद की, उस घर की हर बात है मुझे याद । चिलचिलाती धूप से खेलकर घर लौटना, वो आपका घड़े के पानी से हमारी प्यास बुझाना, सपनो की रातों में कहानियां सुनाना, वो बालों को प्यार से सहलाना । शायद वो यादें घुमाएंगी हमें उन गलियों में, जब देखेंगे हम मुस्कान आपके लगाए, बागवानों की कलियों में । प्यार से गले लगाना भी याद है आपका, वो गोद में खिलाना भी याद है आपका, कुछ समझदारी की बातें बताना भी याद है आपका, वो झूलों पर झुलाना भी याद है आपका । शायद ईश्वर ने आपके जैसा एक ही बनाया, बचपन, जवानी और दुख में, जिसने रोते हुए को हमेशा हंसना सिखाया । --- आदित्य राय (काव्यरंग)

गुरु-शिष्य परंपरा

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कोरे कागज़ पर जिसने लिखना सिखाया, सही गलत का फर्क समझाया, अपने आप से रूबरू करवाया, दुनिया की पहचान कराई, अंधकार जीवन में ज्ञान की रोशनी जलाई । संबंध ऐसा जो गुरु और शिष्य का दर्पण दिखाए , सही मार्ग पर चलकर, ऊंचे शिखर तक पहुंचाए , गुरु वही हैं जो मन में ज्ञान की ज्योति जगाए । जिसने तराश दिया हीरे की तरह हमको, पहचान करवा दिया संसार से हमें, मुश्किलों में तुम आगे बढ़ो,  ऐसा समझदार बना दिया हमें । फूलों की तरह महकना सिखाया, सूरज की तरह जल कर चमकना सिखाया, जाति-धर्म का भेद न समझकर,  सबको एक जैसा सम्मान दिलाया । बिना गुरु कोई ज्ञानी नहीं, हार के बाद भी जीत का हुनर सिखा दे, गुरु वही जो इसानियत की पहचान करा दे। कठिन मार्ग से गुजर कर, सफ़लता के रास्ते पर चलना सिखाया, हौंसला, उम्मीद, आत्मविश्वास जगाकर, हमें अपने आप से पहचान कराया । वही गुरु हैं,जो अपने आप से वाकिफ करा दे, पौधे से वृक्ष बना दें, गुरु वही जो दया का भाव जगा दें, छांव और धूप का ऐसा एहसास, जो गुरु और शिष्य के संबंध को बता दे । ---- अनुराधा मिश्रा (लहरियासराय, दरभंगा, बिहार)

रुक! ज़रा ठहर जा

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रुक ! ज़रा ठहर जा, जीवन की आपा धापी को भूल, ज़रा निखर जा, रुक ! ज़रा ठहर जा । कड़कती धूप की मेहनत में, बारिश में नहाते बदन में, थकान को थोड़ा भूल जा, रुक! ज़रा ठहर जा । कमाने की भागम भाग, कुछ पाने की सुलगती आग, को थोड़ा शांत कर जा, रुक! ज़रा ठहर जा । मंजिल भी मिल जायेगी तुझे, किस्मत भी हंसाएगी तुझे, अगर थोड़ा सा तू खिल जा, रुक ! ज़रा ठहर जा । रुक ! ज़रा ठहर जा । -- आदित्य राय (काव्यरंग)

बाढ़ का पानी

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गांव में बाढ़ का पानी, ये बात सभी ने जानी । डूब गया वो घर जो सपनो को संजोता था, बह गई वो आशा, जिन्होने जीवन को दी थी परिभाषा । ना अब वो गांव है, ना उन पेड़ो की छांव है, बह गया बाढ़ में मेरा गांव है । दुनिया में घूम रहा अब पनाह के लिए, खाने , रहने को देने वाले निगाह के लिए । खेतो की फसल लूट गया बाढ़, बर्बादी का दे गया अंबार । बिजली, पानी , रास्ते, ना अब हमारे वास्ते । नैया भी डूब जाती है,  मौत भी गले लगाती है। कोई न अब अन्नदाता है, पसरा चारो ओर सन्नाटा है । गांव में बाढ़ का पानी है बात सभी ने जानी । -- आदित्य राय (काव्यरंग) यहाँ सुने:- https://open.spotify.com/episode/3aVlgyFoshgr7U6nEKeYly?si=WEJOB_R7QBCIAGfvgXrmtw&dl_branch=1

कैसे ये मंज़र देखूं

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डूबते हुए सूरज कों ढलते हुए देखूं , वक्त के पहिए को गुजरते हुए देखूं , इन मुश्किलों के समय में, खुद को हीं खुद से लड़ते हुए देखूं । रोज़ एक नया ख्वाब टूटते हुए देखूं, हर दिन एक ख्वाहिश का गला घूंटते हुए देखूं, प्यासे की प्यास को, मां की आस को, इंतजार में बदलते हुए देखूं, कैसे ये मंज़र देखूं । ये लम्हा, ये मंजर न जाने कब थमेगा, इस डर में ही सबको सिहरते हुए देखूं, वो जो बेबस हैं, लाचार है आज, उन्हें ही खुद को दिलासा देते हुए देखूं, एक लाल को मां के दामन से लिपटते हुए देखूं । इस खौफनाक मंजर, तन्हाइयों के आलम में, खुद को सिमटते हुए देखूं, इन रुके हुए पलों में ,  रोज़ अपने बीतते हुए कल को देखूं । बस दुआ है उस रब से की अब , इन उदास चेहरों को, फिर से मुस्कुराते हुए देखूं । -- नीलाभ रवि (Bareilly)

बचपन का आशियाना

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  मैं वापस कुछ पल दोहराना चाहता हूं, दोस्तों, मैं बचपन में लौट जाना चाहता हूं। वापस उन दोस्तों को बुलाना चाहता हूं, खूबियां और खामियां भुलाना चाहता हूं। अपनी कुछ करतूतों से हंसान चाहता हूं, मैं जिम्मेदारिया अपनी भूल जाना चाहता हूं। मैं बच्चा बनकर हर डांट से बच जाना चाहता हूं, मैं तोतली आवाज में गीत गुनगुनाना चाहता हूं। सुहावने मौसम का फसाना चाहता हूं, कागज की नाव फिर से बनाना चाहता हूं। स्कूल से थक-थक कर आना चाहता हूं, परियों की कहानी का आनंद पाना चाहता हूं। ऐ समय, ये मुमकिन तो नहीं, परन्तु, मैं तुझे किसी प्रकार रुकवाना चाहता हूं। दोस्तों, मैं बचपन में लौट जाना चाहता हूं।। हां, मैं लौट जाना चाहता हूं।  स्पर्श भटेजा ( Gularbhoj, Rudrapur, Uttarakhand )

आज़ादी

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आज़ाद भारत की खुली हवा मेें, ले रहे चैन की साँस हम, गुलामी की जंजीरों से हो गए आज़ाद हम । नफ़रत की दीवारों को तोड़कर, एकता की लकीरों को जोड़कर, अपनी अंतरात्मा को जागृत कर । शान्ति का दीप जलाकर, इस देश के भाईचारे को बचाकर, उन अमर शहीदों का गुणगान कर । आओ रखे हम अपनी आज़ादी को संभालकर । स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !!! यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e15tvjb -- आदित्य राय ( काव्यरंग )