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Showing posts from September, 2021

दादी-नानी की कहानी

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आपकी लाठी पकड़े दौड़ता था बचपन, बागीचे के उन पेड़ो से जा लगा था मन, आपकी पकवानों के महकते स्वाद की, उस घर की हर बात है मुझे याद । चिलचिलाती धूप से खेलकर घर लौटना, वो आपका घड़े के पानी से हमारी प्यास बुझाना, सपनो की रातों में कहानियां सुनाना, वो बालों को प्यार से सहलाना । शायद वो यादें घुमाएंगी हमें उन गलियों में, जब देखेंगे हम मुस्कान आपके लगाए, बागवानों की कलियों में । प्यार से गले लगाना भी याद है आपका, वो गोद में खिलाना भी याद है आपका, कुछ समझदारी की बातें बताना भी याद है आपका, वो झूलों पर झुलाना भी याद है आपका । शायद ईश्वर ने आपके जैसा एक ही बनाया, बचपन, जवानी और दुख में, जिसने रोते हुए को हमेशा हंसना सिखाया । --- आदित्य राय (काव्यरंग)

गुरु-शिष्य परंपरा

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कोरे कागज़ पर जिसने लिखना सिखाया, सही गलत का फर्क समझाया, अपने आप से रूबरू करवाया, दुनिया की पहचान कराई, अंधकार जीवन में ज्ञान की रोशनी जलाई । संबंध ऐसा जो गुरु और शिष्य का दर्पण दिखाए , सही मार्ग पर चलकर, ऊंचे शिखर तक पहुंचाए , गुरु वही हैं जो मन में ज्ञान की ज्योति जगाए । जिसने तराश दिया हीरे की तरह हमको, पहचान करवा दिया संसार से हमें, मुश्किलों में तुम आगे बढ़ो,  ऐसा समझदार बना दिया हमें । फूलों की तरह महकना सिखाया, सूरज की तरह जल कर चमकना सिखाया, जाति-धर्म का भेद न समझकर,  सबको एक जैसा सम्मान दिलाया । बिना गुरु कोई ज्ञानी नहीं, हार के बाद भी जीत का हुनर सिखा दे, गुरु वही जो इसानियत की पहचान करा दे। कठिन मार्ग से गुजर कर, सफ़लता के रास्ते पर चलना सिखाया, हौंसला, उम्मीद, आत्मविश्वास जगाकर, हमें अपने आप से पहचान कराया । वही गुरु हैं,जो अपने आप से वाकिफ करा दे, पौधे से वृक्ष बना दें, गुरु वही जो दया का भाव जगा दें, छांव और धूप का ऐसा एहसास, जो गुरु और शिष्य के संबंध को बता दे । ---- अनुराधा मिश्रा (लहरियासराय, दरभंगा, बिहार)

रुक! ज़रा ठहर जा

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रुक ! ज़रा ठहर जा, जीवन की आपा धापी को भूल, ज़रा निखर जा, रुक ! ज़रा ठहर जा । कड़कती धूप की मेहनत में, बारिश में नहाते बदन में, थकान को थोड़ा भूल जा, रुक! ज़रा ठहर जा । कमाने की भागम भाग, कुछ पाने की सुलगती आग, को थोड़ा शांत कर जा, रुक! ज़रा ठहर जा । मंजिल भी मिल जायेगी तुझे, किस्मत भी हंसाएगी तुझे, अगर थोड़ा सा तू खिल जा, रुक ! ज़रा ठहर जा । रुक ! ज़रा ठहर जा । -- आदित्य राय (काव्यरंग)