उफ्फ ! ये गर्मी
उफ़्फ़! कैसी है ये गर्मी, बहुत सता रही है ये गर्मी । हवा है, पर ठंडी नहीं, पानी है ,पर प्यास बुझती नहीं । सूरज की किरण है , पर अब वो छाओ नहीं , खेत हैं पर बदलो में वर्षा नहीं । सुख गए है वो सारे नदी-तलाब, जिस पर लिखे गए कितने किताब । घाटों की रौनक फीकी पड़ गयी, धरती पानी की एक बूंद को तरस गयी । ना बजती हैं वो बंसी नदी किनारे, जिसे सुन पंछी लगते थे चहचहाने । उम्मीद तो है ऊपर वाले से, बुझेगी इस धरती की प्यास, तब, जब हम छोड़ेंगे करना, इस प्यारी धरती का उपहास। यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e1611bl -- आदित्य राय (काव्यरंग)