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Showing posts from August, 2021

बाढ़ का पानी

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गांव में बाढ़ का पानी, ये बात सभी ने जानी । डूब गया वो घर जो सपनो को संजोता था, बह गई वो आशा, जिन्होने जीवन को दी थी परिभाषा । ना अब वो गांव है, ना उन पेड़ो की छांव है, बह गया बाढ़ में मेरा गांव है । दुनिया में घूम रहा अब पनाह के लिए, खाने , रहने को देने वाले निगाह के लिए । खेतो की फसल लूट गया बाढ़, बर्बादी का दे गया अंबार । बिजली, पानी , रास्ते, ना अब हमारे वास्ते । नैया भी डूब जाती है,  मौत भी गले लगाती है। कोई न अब अन्नदाता है, पसरा चारो ओर सन्नाटा है । गांव में बाढ़ का पानी है बात सभी ने जानी । -- आदित्य राय (काव्यरंग) यहाँ सुने:- https://open.spotify.com/episode/3aVlgyFoshgr7U6nEKeYly?si=WEJOB_R7QBCIAGfvgXrmtw&dl_branch=1

कैसे ये मंज़र देखूं

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डूबते हुए सूरज कों ढलते हुए देखूं , वक्त के पहिए को गुजरते हुए देखूं , इन मुश्किलों के समय में, खुद को हीं खुद से लड़ते हुए देखूं । रोज़ एक नया ख्वाब टूटते हुए देखूं, हर दिन एक ख्वाहिश का गला घूंटते हुए देखूं, प्यासे की प्यास को, मां की आस को, इंतजार में बदलते हुए देखूं, कैसे ये मंज़र देखूं । ये लम्हा, ये मंजर न जाने कब थमेगा, इस डर में ही सबको सिहरते हुए देखूं, वो जो बेबस हैं, लाचार है आज, उन्हें ही खुद को दिलासा देते हुए देखूं, एक लाल को मां के दामन से लिपटते हुए देखूं । इस खौफनाक मंजर, तन्हाइयों के आलम में, खुद को सिमटते हुए देखूं, इन रुके हुए पलों में ,  रोज़ अपने बीतते हुए कल को देखूं । बस दुआ है उस रब से की अब , इन उदास चेहरों को, फिर से मुस्कुराते हुए देखूं । -- नीलाभ रवि (Bareilly)

बचपन का आशियाना

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  मैं वापस कुछ पल दोहराना चाहता हूं, दोस्तों, मैं बचपन में लौट जाना चाहता हूं। वापस उन दोस्तों को बुलाना चाहता हूं, खूबियां और खामियां भुलाना चाहता हूं। अपनी कुछ करतूतों से हंसान चाहता हूं, मैं जिम्मेदारिया अपनी भूल जाना चाहता हूं। मैं बच्चा बनकर हर डांट से बच जाना चाहता हूं, मैं तोतली आवाज में गीत गुनगुनाना चाहता हूं। सुहावने मौसम का फसाना चाहता हूं, कागज की नाव फिर से बनाना चाहता हूं। स्कूल से थक-थक कर आना चाहता हूं, परियों की कहानी का आनंद पाना चाहता हूं। ऐ समय, ये मुमकिन तो नहीं, परन्तु, मैं तुझे किसी प्रकार रुकवाना चाहता हूं। दोस्तों, मैं बचपन में लौट जाना चाहता हूं।। हां, मैं लौट जाना चाहता हूं।  स्पर्श भटेजा ( Gularbhoj, Rudrapur, Uttarakhand )

आज़ादी

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आज़ाद भारत की खुली हवा मेें, ले रहे चैन की साँस हम, गुलामी की जंजीरों से हो गए आज़ाद हम । नफ़रत की दीवारों को तोड़कर, एकता की लकीरों को जोड़कर, अपनी अंतरात्मा को जागृत कर । शान्ति का दीप जलाकर, इस देश के भाईचारे को बचाकर, उन अमर शहीदों का गुणगान कर । आओ रखे हम अपनी आज़ादी को संभालकर । स्वतंत्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं !!! यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e15tvjb -- आदित्य राय ( काव्यरंग )

भीख

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क्यूं मांगे कोई भीख, जब जीवन में हो सब ठीक। कभी कोई मां मांगती भीख, बच्चों के पेट के लिए । कभी कोई बाप मांगता भीख, रात की चादर ओढ़ने के लिए । कभी कोई बूढ़ी मांगती भीख, अपनी दवाई के लिए । कभी कोई बूढ़ा मांगता भीख, बेटी की विदाई के लिए । हम बोल देते उन्हें भीखमंगे, क्या सोंचा हमने कभी क्या बीत रही उनके जीवन में । दिन बितती बिना कोई रोटी, बदन पे होती ना कोई धोती, घिस जाती एक साड़ी पूरे जीवन में, छांव की तलाश में बीत जाता है जीवन, धूप की किरण में । क्यूं मांगे कोई भीख जब जीवन में हो सब ठीक । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e1612cv -- आदित्य राय (काव्यरंग)

सफ़र की छाँव

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कानो में गूंजती छुक छुक की आवाज़, शायद मन को दूर जाने का एहसास कराती है । कुछ लोग पुकार रहे होते हैं मंजिल की तरफ, कुछ लोग पुकार रहे होते हैं साहिल की तरफ । मन स्थिर होकर भी महसूस न करना चाहता , अपनो से दूर जाने के एहसास को । शायद सफ़र की उन लंबी रातों के लिए बचा लेते हैं, हम उन एहसासों को , उन सिसकती आवाज़ो को । अनजानों के साथ सफ़र करना मुश्किल ना होता , अगर राहों में अपना साथी हमसफर सा होता, मंजिल के बारे में सोचता मन शांत पंछी सा होता, भीड़ में शायद अपनो के होने का भी एहसास होता । लंबे सफर को भी नहीं पता होता की वो इतनी लंबी हो जायेगी । खेतो , पहाड़ों, नदियों, शहर, गांव, हवा, पानी, दरिया, पेड़ो की छांव, उन रास्तों के उबासी के वो भाव । लगता हैं जैसे मंजिल पुकार रही हो,  अपने आवाज़ को बुलंद कर रही हो । आना है तुम्हे , अधूरे कुछ काम रह गए हैं, जीवन की डोर के कुछ पहलू  अभी खोलने को बाकी रह गए हैं । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e1612qf -- आदित्य राय ( काव्यरंग )

सुकून

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मैं एक मुस्कुराता चेहरा हूं, हजारों ख्वाहिशों से लिपटा, हजारों बंदिशों में जकड़ा, रिश्तों के कच्चे धागों को सहेजता, एक डरता हुआ मन, पर एक खिलखिलाता चेहरा हूं । मैं जीता हूं जरूर पर खुल के नहीं, होठों पर मुस्कान तो हैं पर वो सच्ची नहीं, पता नहीं क्या ढूंढता हूं अपने आस पास, पर वो जो भी है, इतनी आसानी से मिलता नहीं । एक तलाश है जो कब से कर रहा हूं, चलते चलते थक रहा हूं, फिर रुक रहा हूं, शायद देखा है उसे  एक नन्ही सी जान  की मुस्कान में, सब कहते हैं जिसे ढूंढ रहा हूं, सुकून कहते हैं उसे, जो नहीं मिलता आज भी किसी बड़ी दुकान में । -- मोनिका ( काव्यरंग ) Pic credits : Suman Sourabh

मेरा छोटा शहर

सोच की धाराएं

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सोच की धाराएं हैं अनेक, समस्याएं सुलझाती सब एक । अनंत हैं इस धरती पर रूप प्रकृति के, रंग है अनेक, मिलने पर बन जाती सब एक । नदियां अनेक , झील अनेक समुंदर की लहरों संग लहराती सब एक । पक्षी अनेक , परिंदे अनेक, घोसलों में दाना लेकर जाने की कला है एक । पेड़ अनेक , पौधे अनेक, जड़ से जुड़े रहने की आदत है एक । भाषाएं अनेक , भेष अनेक, घुलने मिलने की भावनाएं है एक । विद्याएं अनेक, कलाएं अनेक, सरस्वती के आंगन में उपजे सब एक । धर्म अनेक ,गुरु अनेक, शांति के उपदेशों संग , ज्ञान की बहती धारा है एक । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e15sq2p -- आदित्य राय (काव्यरंग)

रात की चांदनी

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ऐ चाँद तेरी चाँदनी की कसम, अगर तू ना होता तो, रात में किसे निहारते हम । नीले आकाश में जगमगा रहा है तू, तारो की आगोश में समा रहा है तू । रात की कली हैं तेरी चाँदनी, जिसे तोड़ना चाहता हैं हर आदमी । पूर्णिमा ,अमावस्य तेरे हैं दो छोर, जिसमे समा जाते हैं कई भोर । जुगनू से जगमगाते बल्ब के बीच, तेरी चाँदनी कर रही हर रात को सींच । कितने नगमे लिखे गए तेरी चाँदनी पर, फिर भी ना आया तू इस ज़मीन पर । शायद हमसे रूठा हैं तू, अपनी रोशनी ना होने का गम छुपाता हैं तू । एक बार तू हमारे करीब तो आ, हमें एक बार छू तो जा, तेरी दुनिया में आने को बेताब हैं हम, तेरे दिल में अपना आशियां बनाने को तैयार है हम । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e15tvst -- आदित्य राय ( काव्यरंग )

यादों की तस्वीर

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यादों की दुनिया हैं तस्वीर, जिसके पास है सुनहरी यादेँ, वो हैं दुनिया में सबसे अमीर । बचपन की वो गलियां, घुमाती हैं तस्वीरों की दुनिया । भाई बहन के एक दूसरे के कंधों पे रखे हाथ, वो तस्वीर जिगरी दोस्तो के साथ, नाचते गाते पिकनीक मनाते, एक दूसरे के जन्मदिन में गाते । जवानी की दहलीज़ पर रखते कदम, बचपन की तस्वीरों से दूर जाते वो हम । नए चेहरों का होता हमारे तस्वीरों में आगमन, पुरानी यादों को सहेज मंद मंद मुस्काते हम । जब घर जाते तो पलटते वो एल्बम के पन्ने, पुरानी यादों को समेटना चाहते थोड़े ही पल में । नए लोग पुकारते कहते ,आजा लेले तस्वीर उस पल की, जो खो जाएंगे कुछ ही पल में । वो लोग भी हमसे दूर चले जाते हैं, रह जाते हम उन तस्वीरों के सहारे ही हैं । तस्वीरों की कीमत हम तब ही समझ पाते हैं, जब वो पल हम कही ढूंढ नहीं पाते हैं । हर तस्वीर की कहानी कुछ बयां कर जाती हैं, पुराने पलों की कीमत हमें समझा जाती हैं । तस्वीरों की दुनिया अनोखी होती हैं, थोड़ा हँसाती हैं ,थोड़ा गुदगुदाती हैं । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e15s86q -- आदित्य राय (काव्यरंग)

ईश्वरीय चक्र

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ईश्वर एक है, पर उनकी रचनाएं अनेक हैं, धरती ,अंबर ,जल ,आकाश, मनुष्य - पशु के एक ही जगह पर वास । शरद, ग्रीष्म, बसंत की, चलती जब बयार, हो जाते हम अभिभूत, देते इश्वर को आभार । अनेकों जीव इस धरती पर, हो जाते हम अचंभित, की कैसे रचा होगा इश्वर ने ये संसार ? की सबके रहने की व्यवस्था, खाने को दिए फल हज़ार । एक ही जीवन में अनुभव होते अनेक, हम सोचते, लगता है कम पड़ेगा जीवन एक । समय का पहिया तेजी से बढ़ता आगे, लगता छोड़ कर हमें सब भागे । पर इश्वर ने लिख रखे है सब भाग्य हमारे, ना मिला किसी को किस्मत से ज्यादा, ना जिया किसी ने जीवन अपना आधा । संसार के चक्र में आया जो भी, ना मिला उसे कुछ भी बनकर लोभी । ईश्वर ने जो दिया इस जीवन में सब वापस लिया अपने शरण में । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e162a55 -- आदित्य राय ( काव्यरंग )

जाति

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जाति ना पूछो हमारी, बस इंसानियत है हमें आती । कट गए कितने सिर इस दंश के कारण, मिट गए कितने वंश इस दंश के कारण । बीत गई कितनी सदियां, सुख गई कितनी नदियां, हो गए कितने आविष्कार, बदल गई कितनी सरकार, पर मिट ना सका इस जाति का हाहाकार । देश ने देख ली आज़ादी की लड़ाई, उस महात्मा की अगुआई, उस भगत की विदाई, जिन्होंने लड़ी थी जी जान से, उस जाति की लड़ाई , जिसने कभी इंसान को इंसान से ना लड़ाई । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e15sqm5 -- आदित्य राय ( काव्यरंग )

बाल श्रम

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बालक मन अबोध है, ना श्रम कराओ उससे, उसके बढ़ने में वो अवरोध है । ज्ञान का दीप जलाने को, बेताब उसका मन है, पोषक अन्न खाने को, तड़प रहा उसका तन है । काली कोठरी में बंद कर रखा है, जालिमों ने उन्हें । रोशनी,हवा, पानी, आकाश, ढूंढ रहे है सब उन्हे । किताब कॉपी की ना भेंट हुई उनसे, खिलौनों ने भी मुंह फेर लिया उनसे । दो पाई क्या कमाएंगे वो, अपना बचपन गवांकर अपने मां- बाप के लिए । आग की भट्टी में तड़पकर, झुलस जाएगा जीवन उनका अपने पेट की ज्वाला बुझाने के लिए । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/--e15sqvr -- आदित्य राय (काव्यरंग)

बैचलर

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हम बैचलर ही अच्छे हैं, कम से कम दिल के तो सच्चे हैं । माँ का प्यार हैं , पापा की दुलार, भाई की फटकार हैं , बहन की पुकार हैं । घूमते हैं गलियों में फूलों की तलाश में, घर बनाते हैं हम नीले आकाश में । दोस्तों की मंडली हैं, वहीं लिखी हमने अपनी कुंडली हैं । न सपनों के टूटने का डर हैं, न किसके रूठने की फिकर हैं, यूंही चलता जा रहा अपना ये सफ़र है । हम बैचलर हीं अच्छे है, कम से कम दिल के तो सच्चे हैं । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e15s6ef/a-a6bb4ii -- आदित्य राय (काव्यरंग)

लक्ष्य की ओर

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जुनून जुटा रहा हूं, जोशीले गीत गुनगुना रहा हूं । हैं लक्ष्य को भेदना मुझे, धारा का रुख हैं मोड़ना मुझे । धुंधली सी दिखती हैं, लक्ष्य की तस्वीर मुझे । चुनौती देती दिखती हैं, रास्ते की ठोकरें मुझे । हैं समय सीमित पाने में उसे, तैयारियों में कमी ना रह जाए कोई, इसलिए जागते रहने कि जरुरत हैं मुझे । सीखता हूं हर रोज़ कुछ नया, ज़िन्दगी हर रोज लेती कोई रुख नया । लक्ष्य से भटकना ना भाता मुझे, लक्ष्य को पाने का जोश जगाता मुझे । बहुत झेला है इस मुकाम पर आने को, लक्ष्य को अपने आँखो में बसाने को । थक जाता हूं कभी कभी, पर याद आता है कि जागा हूं अभी अभी । मुसीबतों के पहाड़ को पार करना हैं, लक्ष्य पा कर ही दम भरना हैं  । चाहें रास्ते में कितने भी कांटे बिछे हो, फूल समझ कर उन्हें पार करना है । यहां सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e15splb -- आदित्य राय ( काव्यरंग)

प्रकृति के रंग

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मैं ज़मीन हूं , तू उसे सींचता हुआ हल, मैं नदी हूं , तू उसमें बहता हुआ जल, मैं आसमान हूं , तू उसमें वर्षा लाता हुआ बादल । मैं इंद्रधनुष हूं , तू उसमें जगमगाता हुआ रंग, मैं पहाड़ हूं, तू उसमें इठलाता हुआ ढंग । मैं शीतल जल हूं, तू उसमें समाया ठंडक, मैं मंदिर हूं, तू उसमें रखा ईश्वर का रूपक । मैं हवा हूं, तू उसमें बहती बयार, मैं झील हूं, तू उसमें गिरते पानी की बौछार । मैं गांव की मस्जिद हूं, तू उसमें अता होती नमाज़, मैं कल की सोच हूं, तू उसे उकसाती आज, मैं पंछी हूं, तू उस कोयल की आवाज़ । मैं दिन का सूरज हूं, तू सुबह की अज़ान, मैं सितार बजाता, तू उससे निकलती तान । मैं दीपक हूं, तू उसकी लौ, मैं पेड़ हूं, तू उसकी छौ । मैं वो इंसान हूं, जिसे चलाता तू इंधन, तुझे देखते सोंचते कट जाए मेरा ये जीवन । यहाँ सुने:- https://anchor.fm/aditya-rai79/episodes/ep-e15u059 -- आदित्य राय (काव्यरंग) Pic credit: Suman Sourabh